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भारत में सहकारी आंदोलन अपने उद्भव के लिए सरकार के समर्थन का आभारी है। इस विषय पर सर फैडेरिक निकल्सन (1885) की पहली महत्वपूर्ण रिपोर्ट में ” प्रबुद्ध सहकारी नेतृत्व ” की भूमिका पर बल दिया गया। मैकेलगन समिति ने पंजीकरण के पहले तथा बाद में शिक्षण की कमियों को सहकारी समितियों की अधिकांश खामियों के लिए उत्तरदायी ठहराया। कृषि पर राॅयल आयोग (1928) ने सहकारिता के सिद्धांतों एवं उसके अर्थ के लिए अध्यवसायी एवं चिरस्थायी/निरंतर शिक्षा की आवश्यकता के साथ-साथ सहकारी आंदोलन की संरचना में लगे स्टाफ के प्रशिक्षण पर बल दिया।

प्रांतीय सरकारों द्वारा नियुक्त अन्य विभिन्न समितियों ने भी सदस्य शिक्षा एवं स्टाफ के प्रशिक्षण के महत्व पर बल दिया।

भारत सरकार द्वारा 1935 में केंद्रीय सहायता की मैल्काॅम डार्लिंग योजना को स्वीकृति प्रदान किए जाने के पश्चात् ही इन गतिविधियों को प्रोत्साहन मिला। मद्रास, बम्बई एवं बंगाल के महाप्रांतों, संयुक्त प्रांतो, पंजाब, बिहार एवं केंद्रीय प्रांतों ने सहकारी प्रशिक्षण संस्थान स्थापित किए, शैक्षिक भ्रमण आयोजित किए तथा सहकारिताओं के सदस्यों को शिक्षित करने के लिए अन्य गतिविधियां आयोजित कीं।

सहकारी नियोजन पर गठित सरैया समिति ने 1945 में इन विकासों की समीक्षा की। इसने न केवल प्रत्येक राज्य में सहकारी प्रशिक्षण महाविद्यालय स्थापित करने बल्कि केंद्रीय स्तर पर प्रगतिशील (एडवांस्ड) अध्ययन एवं अनुसंधान के लिए सहकारी प्रशिक्षण संस्थान स्थापित किए जाने की भी अनुशंसा की। तथापि इस क्षेत्र में अधिक सफलता हासिल नहीं की जा सकी, अतः इस दौरान सहकारी प्रशिक्षण एवं शिक्षण अधिकतर “प्रंातीय” सरकारों के नेतृत्व पर निर्भर रहा। सहकारी प्रशिक्षण एवं शिक्षण गतिविधियों के संवर्द्धन के लिए कोई विशेष केंद्रीय अभिकरण (एजेंसी) न होने पर कुछ सहायता एवं सतत प्रेरणा प्रांतीय सरकारों द्वारा प्रदान कराई गई।

1953 मे सहकारी प्रशिक्षण की केंद्रीय समिति (सीसीसीटी) के रूप में केंद्रीय अभिकरण (एजेंसी) का अभ्युदय हुआ। भारतीय रिजर्व बैंक (आर.बी.आई) द्वारा पहली बार इसका गठन सहकारी संस्थानों एवं अन्य संबंधित कार्यकलापों के लिए वरिष्ठ एवं मध्यस्तरीय कार्मिकों के लिए क्षेत्रीय प्रशिक्षण केंद्रों को स्थापित करने के लिए किया गया। भारत सरकार द्वारा इसका अंगीकरण ब्लाक स्तरीय सहकारी विस्तार अधिकारियों एवं अन्य सहायक श्रेणी के सहकारी कार्मिकों के लिए प्रशिक्षण के आयोजन एवं पर्यवेक्षण के साथ-साथ देश में सहकारी प्रशिक्षण एवं शिक्षण के संवर्द्धन हेतु सामान्य परामर्श देने के लिए किया गया। 13 क्षेत्रीय सहकारी प्रशिक्षण केंद्रो की स्थापना भारतीय रिजर्व बैंक तथा भारत सरकार द्वारा संयुक्त रूप से क्रमशः मध्य स्तरीय, उच्च एवं सहायक स्तरीय सहकारी कार्मिकों को प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए की गई।

1956 में पंजीकृत अखिल भारतीय सहकारी संघ को केंद्रीय समिति द्वारा सहकारी समितियों के सदस्यों तथा निर्वाचित पदाधिकारियों के शिक्षा कार्य का बीड़ा उठाने के लिए प्रोत्साहित किया गया।

1960 में भारत सरकार के तत्कालीन संसदीय सचिव श्री एस.डी. मिश्रा के नेतृत्व में सहकारी प्रशिक्षण के लिए केंद्रीय समिति (सी.सी.सी.टी) के अंतर्गत सहकारी प्रशिक्षण सुविधाओं के निष्पादन एवं प्रगति की पुनरीक्षा हेतु सहकारी प्रशिक्षण पर एक अध्ययन दल नियुक्त किया गया। 1962 में समिति की अनुशंसाओं ने भारत में सहकारी प्रशिक्षण एवं शिक्षा की प्रथम अवस्था के प्रारंभिक संकेत दिए। भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ की उप-विधियों में सहकारी आंदोलन के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों के पर्यवेक्षण एवं कार्यान्वयन हेतु सहकारी प्रशिक्षण के लिए समिति (सी.सी.टी) के गठन किए जाने का प्रावधान किया गया। परिणामस्वरूप, भा.रा.सह. संघ के तत्वावधान में सहकारी प्रशिक्षण के लिए समिति (सी.सी.टी) का गठन किया गया तथा भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा सभी 13 मध्यस्तरीय सहकारी प्रशिक्षण केंद्रों को इसमें स्थानांतरित कर दिया गया।

1967 में राष्ट्रीय सहकारी महाविद्यालय तथा अनुसंधान संस्थान तथा उपभोक्ता व्यवसाय के केंद्रीय प्रबंध संस्थान का एकीकरण वैकुंठ मेहता राष्ट्रीय सहकारी प्रबंध संस्थान (वैमनीकाॅम) पुणे को स्थापित करने के लिए किया गया।

डा0 एम.एस. स्वामीनाथन की अध्यक्षता में गठित सहकारी शिक्षा, प्रशिक्षण एवं अनुसंधान पर अनौपचारिक विशेषज्ञ दल (1974) ने सहकारी शिक्षा अनुसंधान एवं प्रशिक्षण के लिए परिषद (सी.सी.ई.आर.टी.) नामक केंद्रीय अभिकरण की स्थापना किए जाने की अनुशंसा की।

स्वामीनाथन समिति की अनुशंसाओं के क्रियान्वयन पर सलाह देने के लिए नियुक्त जेनुअल अबेदिन समिति (1975) ने सलाह दी कि केंद्रीय अभिकरण भा.रा.सह.संघ (एन.सी.यू.आई) के अंतर्गत ही राष्ट्रीय सहकारी प्रशिक्षण परिषद् (एन.सी.सी.टी.) के नाम से पृथक भाग के रूप में स्थापित होगा। अतः रा.सह.प्र. परिषद् (एन.सी.सी.टी.) अस्तित्व में आई जिसने सहकारी प्रशिक्षण के लिए समिति (सी.सी.टी) को प्रतिस्थापित किया।

वर्ष 1976 में सहकारी प्रशिक्षण के लिए केंद्रीय समिति (सी.सी.सी.टी.) को भारत सरकार की पूर्व अनुमति से भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ की उप-विधि 16-ए के अंतर्गत गठित एक निकाय-रा.सह.प्र. परिषद् (एन.सी.सी.टी.) के रूप में प्रतिस्थापित किया गया।

निम्न सूची में दी गई विभिन्न अन्य समितियों ने रा.सह.प्र. परिषद् (एन.सी.सी.टी.) के कार्यकलापों का मूल्याकंन किया:

  • श्री एम. रामाकृष्णैया, उप-राज्यपाल, भारतीय रिजर्व बैंक (आर.बी.आई) की अध्यक्षता में वन मैन इवैल्यूएशन समिति।
  • संयुक्त सचिव (सहकारिता), कृषि मंत्रालय, कृषि एवं सहकारिता विभाग, कृषि भवन, नई दिल्ली की अध्यक्षता में विशेषज्ञ समिति।
  • भारतीय प्रबंध संस्थान, अहमदाबाद द्वारा मूल्यांकन।

स.प्र. परिषद् का गठन भा.रा.सह. संघ द्वारा भारत सरकार के अनुमोदन से तब तक जारी रखा जाएगा जब तक भारत सरकार रा.स.प्र. परिषद् को अनुदान देती रहेगी। इस उप-विधि के अनुसार रा.स.प्र. परिषद् के निम्नलिखित कार्यकलाप हांेगेः-

  • सहकारी प्रशिक्षण से संबंधित सम्पूर्ण नीतियों एवं योजनाओं को बनाना।
  • देश के सहकारी विभागों एवं सहकारी संस्थानों में कार्यरत कार्मिंकों की प्रशिक्षण संबंधी व्यवस्थाओं का संगठन एवं निर्देशन।
  • प्रशिक्षण व्यवस्थाओं के नियोजन एवं अभिकल्पना को सुविधाजनक बनाने के लिए सहकारी कार्मिंकों की प्रशिक्षण आवश्यकताओं का सामयिक मूल्यांकन करना (ऐसा मूल्यांकन अधिमानतः पंचवर्षीय योजना अवधि के लिए होगा)
  • सहकारी प्रशिक्षण से संबंधित प्रकरणों में भारत सरकार, वित्तीय संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालय सहित अन्य विश्वविद्यालय, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, अन्तर्राष्ट्रीय सहकारी मैत्री संघ आदि जैसे अन्तर्राष्ट्रीय अभिकरणों की गतिविधियों के साथ समन्वय तथा उनसे प्रभावशाली सम्पर्क स्थापित रखना।
  • सहकारी प्रशिक्षण संस्थानों को स्थापित करना तथा उनका प्रबंधन देखना।
  • अनुसंधान की अपेक्षा रखने वाली सहकारिताओं के समस्या वाले क्षेत्रों की पहचान करना तथा सहकारी अनुसंधान संस्थानों को स्थापित करने तथा उनके प्रबंधन हेतु अनुसंधान अध्ययन आयोजित करना।
  • सहकारी प्रशिक्षण संस्थानों के प्रशिक्षण स्टाफ के लिए प्रशिक्षण का प्रबंध करना।
  • देश के विभिन्न संस्थानों में सहकारी शिक्षा एवं प्रशिक्षण के उच्च शैक्षिक मानकों के रख-रखाव को सुनिश्चित करना तथा विभिन्न पाठ्यक्रमों की परीक्षाओं के लिए पाठ्यचर्या तथा मानकों का सुझाव देना।
  • विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में सहकारी शिक्षा का संवर्द्धन करना, इस प्रयोजन हेतु पाठ्यचर्या एवं परीक्षा के मानकों का सुझाव देना तथा सहकारिता पर मानक पाठ्य – पुस्तकों का प्रकाशन करना।
  • वैकुंठ मेहता राष्ट्रीय सहकारी प्रबंध संस्थान के लिए एक राष्ट्रीय महत्व के संस्थान के रूप में मान्यता प्राप्त करने की संभावना का पता लगाना अथवा इसके मानित विश्वविद्यालय (डीम्ड यूनिवर्सिटी) के रूप में मान्यता की संभावनाओं का पता लगाना।
  • सहकारी प्रशिक्षण के विभिन्न पाठ्यक्रमों का मूल्याकंन करना तथा उनमें सुधार के लिए उपायों का सुझाव देना।
  • प्रबंध की समस्याओं के विशेष संदर्भ में सहकारिताओं के लिए परामर्शदात्री सेवाओं के प्रावधान का प्रबंध करना।
  • केंद्रीय सरकार, सहकारिताओं तथा अन्य संस्थानों से अनुदान, शुल्कों, अंशदान एवं योगदान के रूप में निधियां एकत्रित करना।

(A Grant-in-Aid Institution under Ministry of Agriculture, Government Of India)